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कमजोर वर्गों तक न्याय पहुंचाना ही व्यवस्था की असली कसौटी: मुख्यमंत्री सुक्खू

➤ न्याय का असली उद्देश्य कमजोर वर्गों तक न्याय पहुंचाना: मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू

➤ एनएलयू शिमला के तीसरे दीक्षांत समारोह में न्याय व्यवस्था, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी पर जोर

➤ न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश ने कानून के विद्यार्थियों को बताया सामाजिक बदलाव का अहम माध्यम


शिमला। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने कहा कि न्याय का वास्तविक उद्देश्य केवल अदालतों में आदेश जारी करना नहीं, बल्कि समाज के कमजोर और वंचित वर्गों तक न्याय पहुंचाना है। न्याय व्यवस्था की सार्थकता तभी है, जब फैसलों में निष्पक्षता, विवेक और परिस्थितियों की सही समझ दिखाई दे। उन्होंने कानून के विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपने पेशेवर जीवन में न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।

मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू शिमला) के तीसरे दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने न्यायपालिका की भूमिका, समय पर न्याय उपलब्ध कराने की आवश्यकता और कानूनी फैसलों के व्यापक सामाजिक एवं आर्थिक प्रभावों पर अपने विचार रखे। समारोह में विद्यार्थियों को उपाधियां और स्वर्ण पदक प्रदान किए गए। देश की न्यायपालिका से जुड़े कई वरिष्ठ न्यायाधीश और विधि क्षेत्र की प्रमुख हस्तियां भी कार्यक्रम में उपस्थित रहीं।

न्याय के साथ जनहित और आर्थिक पहलुओं पर भी विचार जरूरी

मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि सरकार समय पर न्याय उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है और न्यायपालिका लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। न्याय से जुड़े निर्णयों में निष्पक्षता और संवैधानिक सिद्धांतों के साथ-साथ उनके व्यावहारिक प्रभावों को समझना भी जरूरी है।

उन्होंने कुछ न्यायिक फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि भर्ती नियमों, कर्मचारियों के लाभ और सरकारी वित्तीय दायित्वों से जुड़े मामलों में कई बार ऐसे प्रश्न सामने आते हैं, जिनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है। ऐसे मामलों में कर्मचारियों के हितों, जनहित और राज्य की वित्तीय स्थिति के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

मुख्यमंत्री ने वर्ष 2003 में संविदा कर्मचारियों की वरिष्ठता और वेतन वृद्धि से संबंधित एक मामले का संदर्भ भी दिया। उन्होंने कहा कि संबंधित प्रावधानों और नियमों की व्याख्या से जुड़े मामलों में लंबे समय बाद आने वाले निर्णयों का वित्तीय प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक और प्रशासनिक निर्णयों के व्यापक परिणामों को समझना आवश्यक है, ताकि न्याय के उद्देश्य के साथ सार्वजनिक संसाधनों और जनहित का भी ध्यान रखा जा सके।

हिमाचल की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार सुविधाओं का उपयोग जरूरी

मुख्यमंत्री ने हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि पहाड़ी राज्य होने के कारण यहां खेल मैदानों और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध कराना कई बार चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ऐसे में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना जरूरी है।

उन्होंने विद्यालयों और सामुदायिक स्तर पर उपलब्ध खेल मैदानों के साझा उपयोग की आवश्यकता पर भी विचार रखे। मुख्यमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस समारोह के आयोजन के लिए सरकारी स्कूल के खेल मैदान के उपयोग के संदर्भ में पांच लाख रुपये के भुगतान का उल्लेख किया। यह व्यवस्था हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की निर्धारित शर्त के अनुरूप थी। इस उदाहरण के माध्यम से सार्वजनिक सुविधाओं के उपयोग, निर्धारित नियमों और संस्थागत जिम्मेदारियों के महत्व को रेखांकित किया गया।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार शिक्षा और संस्थागत विकास को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी दिशा में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) और राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए सरकारी सहयोग का भी उल्लेख किया गया।

कानून के विद्यार्थी समाज में बदलाव के वाहक: न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश

समारोह में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश ने कानून के विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्हें समाज के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला बताया। उन्होंने कहा कि कानून के विद्यार्थी और विधि पेशे से जुड़े लोग केवल कानूनी प्रावधानों के जानकार नहीं होते, बल्कि वे समाज को बेहतर दिशा देने में भी योगदान कर सकते हैं।

न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कानून के विद्यार्थियों को “सामाजिक अभियंता, सामाजिक चिकित्सक और सामाजिक वास्तुकार” की भूमिका निभाने वाला बताया। उनका संदेश था कि विधि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना या पेशेवर सफलता प्राप्त करना नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी समझना और लोगों की समस्याओं के समाधान में योगदान देना भी जरूरी है।

उन्होंने विद्यार्थियों से अपने कानूनी ज्ञान और विशेषज्ञता को लगातार बेहतर बनाने का आह्वान किया। साथ ही, कृत्रिम मेधा (एआई) और उभरती तकनीकों के बढ़ते प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि बदलते समय के अनुरूप कानून के क्षेत्र में नई तकनीकों की समझ विकसित करना आवश्यक है।

विद्यार्थियों को मिले स्वर्ण पदक और विधि की उपाधियां

एनएलयू शिमला के तीसरे दीक्षांत समारोह में मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक प्रदान किए। न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया ने विद्यार्थियों को डिग्रियां प्रदान कीं।

समारोह में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, त्रिपुरा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएस रामचंद्र राव और झारखंड हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति त्रिलोक सिंह चौहान को डॉक्टर ऑफ लॉ की मानद उपाधियां प्रदान की गईं।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. प्रीति सक्सेना सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित रहे। दीक्षांत समारोह में विद्यार्थियों की शैक्षणिक उपलब्धियों का सम्मान करने के साथ-साथ न्याय, सामाजिक जिम्मेदारी और बदलते तकनीकी परिवेश में विधि शिक्षा की भूमिका पर भी चर्चा हुई।

समारोह का संदेश स्पष्ट रहा कि कानून की शिक्षा केवल अदालतों और कानूनी प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य समाज में न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करना तथा उन लोगों तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करना है, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।